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गर्दिशों का दौर है ये, यु ना खुद को शर्मिंदा कर आना है ‘नया’ लौटकर, उम्मीद अपनी ज़िंदा कर अच्छे बुरे सब दिन ढले हैं, ये भी तो ढल जायेंगे हौसले का ये खेल हैं ‘पुष्पक’, खुद को तू परिंदा कर पुष्पक दिल से…

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गर्दिशों का दौर है ये, यु ना खुद को शर्मिंदा कर  आना है 'नया' लौटकर, उम्मीद अपनी ज़िंदा कर  अच्छे बुरे सब दिन ढले हैं, ये भी तो ढल जायेंगे  हौसले का ये खेल हैं 'पुष्पक', खुद को तू परिंदा कर   पुष्पक दिल से...
गर्दिशों का दौर है ये, यु ना खुद को शर्मिंदा कर
आना है ‘नया’ लौटकर, उम्मीद अपनी ज़िंदा कर
अच्छे बुरे सब दिन ढले हैं, ये भी तो ढल जायेंगे
हौसले का ये खेल हैं ‘पुष्पक’, खुद को तू परिंदा कर
पुष्पक दिल से…



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