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जब अपराधी या बलात्कारी, जाति का सिरमौर बनें। पुलिस-केंद्र व न्यायालय, बदनीयतों की ठौर बनें। जब अखबार छपने से, पहले ही बिक जाते हों। पत्रकार मनपसंद दरबारों में, सिर झुकाते हों। तो समझो देश की, खुशहाली जाने वाली हैं। फिर से आम लोगों के लिए 'पुष्पक', काली रात आने वाली है।

जब अपराधी या बलात्कारी, जाति का सिरमौर बनें। पुलिस-केंद्र व न्यायालय, बदनीयतों की ठौर बनें। जब अखबार छपने से, पहले ही बिक जाते हों। पत्रकार मनपसंद दरबारों में, सिर झुकाते हों। तो समझो देश की, खुशहाली जाने वाली हैं। फिर से आम लोगों के लिए ‘पुष्पक’, काली रात आने वाली है।

जब अपराधी या बलात्कारी, जाति का सिरमौर बनें।पुलिस-केंद्र व न्यायालय, बदनीयतों की ठौर बनें।जब अखबार छपने से, पहले ही बिक जाते हों।पत्रकार मनपसंद दरबारों में, सिर झुकाते हों।तो समझो देश की, खुशहाली जाने वाली हैं।फिर से आम लोगों के लिए 'पुष्पक', काली रात आने वाली है।

जिंदगी तुझको भी आजमा के देख लिया। तू भी बेवफा निकली किसी बेवफा की तरह। ‘पुष्पक’ ने बेइंतहा टूट कर, चाहा था तुम्हें। पर तू भी मुक़मल हुई, सिर्फ एक सज़ा की तरह॥

जिंदगी तुझको भी आजमा के देख लिया।तू भी बेवफा निकली किसी बेवफा की तरह।'पुष्पक' ने बेइंतहा टूट कर, चाहा था तुम्हें।पर तू भी मुक़मल हुई, सिर्फ एक सज़ा की तरह॥
याद का दीपक जलता है जब आसानी से जो मिलता है, तो कौन उसे पूछता है। न मिले तो खोजता है। बचपन के दिन थे, बातें सुहानी थी। मेरे बाबा मेरे साथ थे, पर मुझमे वो बात न थी। जो उनने दिखाना चाहा, मैं देख न पायी। बालमन का चंचल पंछी, खेलने को दौड़ पड़ी। यादों का दीपक अक्सर, मेरे मन में जलता है, जो आसानी से मिल जाये उसे कोण पूछता है। काश वो दिन आ जाये, जो बाबा मेरे पास हो, अज्ञान का तिमिर हटाने को, चेतना का प्रकाश हो। अतीत की सुनी राहों में मन सुकून को ललचता है। बाबा की बातें याद कर, यादों का दीपक जलता है। सविता की कलम से

याद का दीपक जलता है जब आसानी से जो मिलता है, तो कौन उसे पूछता है। न मिले तो खोजता है। बचपन के दिन थे, बातें सुहानी थी। मेरे बाबा मेरे साथ थे, पर मुझमे वो बात न थी। जो उनने दिखाना चाहा, मैं देख न पायी। बालमन का चंचल पंछी, खेलने को दौड़ पड़ी। यादों का दीपक अक्सर, मेरे मन में जलता है, जो आसानी से मिल जाये उसे कोण पूछता है। काश वो दिन आ जाये, जो बाबा मेरे पास हो, अज्ञान का तिमिर हटाने को, चेतना का प्रकाश हो। अतीत की सुनी राहों में मन सुकून को ललचता है। बाबा की बातें याद कर, यादों का दीपक जलता है। सविता की कलम से

याद का दीपक जलता हैजब आसानी से जो मिलता है, तो कौन उसे पूछता है।न मिले तो खोजता है।बचपन के दिन थे, बातें सुहानी थी।मेरे बाबा मेरे साथ थे, पर मुझमे वो बात न थी।जो उनने दिखाना चाहा, मैं देख न पायी।बालमन का चंचल पंछी, खेलने को दौड़ पड़ी।यादों का दीपक अक्सर, मेरे मन में